जिला कांगड़ा में स्थित ऐतिहासिक और चमत्कारी धार्मिक स्थलो की लिस्ट

Kangra historical

जिला कांगड़ा – हिमाचल प्रदेश में धोलधार की पहाड़ियों में वसा एक बहुत ऐतिहासिक वह लोकप्रिय स्थान है। काँगड़ा में बहुत से पौराणिक धार्मिक स्थान है। जहा हर साल देश विदेश से बहुत से शर्दालु आते है। यहाँ हिमचाल प्रदेश की सबसे ज्यादा जनता निवास करती है। काँगड़ा में बहुत से ऐसे स्थान है। जो बहुत ही लोकप्रिय और मनमोहक है। काँगड़ा को वीरो की भूमि भी कहा जाता है।

यहां बहुत से शक्तिपीट है, काँगड़ा जिले में अलग अलग समुदाय के लोग रहते है। जो अलग अलग धर्मो को मानते है। काँगड़ा में ऐसे बहुत से तीर्थ स्थल है। जो हिन्दुओ के आकर्षण का मुख्य कारण है। काँगड़ा घाटी इतिहास से ही चर्चा में रही है। यहां बहुत से हिन्दु राजाओ ने राज किया। और बहुत से इतिहासिक मंदिरो का निर्माण करवाया।

ब्रजेश्वरी मंदिर काँगड़ा

यह मंदिर काँगड़ा बस स्टॉप से कुछ दुरी में स्थित ऐतिहासिक मंदिरो में से एक है। यह हिन्दुओ का धार्मिक स्थल है। हर साल नवरात्रो में यहां बहुत से भगतो की भीड़ लगी रहती है। देश की हर स्थान से पर्टयक आते है। यहां आ के श्रद्धालु के हर दुख दूर हो जाते है। पोर्नो के अनुसार यहां माँ सती का दाहिना वक्ष गिरा था। यहां तीन धर्मों के प्रतीक के रूप में मां की तीनो पिण्डियों की पूजाकी जाती है। कहा जाता है की जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से दर्शन के लिए आता है।

माँ ज्वाला जी Himachal प्रदेश Kangra में स्थित का अद्भुत,अविवसनीय,अकाल्पनिक एक चमत्कारी मंदिर

यह मंदिर काँगड़ा जिले में स्तिथ एक ऐतिहासिक मंदिर है। जो 14वीं शताब्दी का माना जाता है,यह हिमाचल प्रदेश में स्तिथ प्रशिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है। यहां बहुत से श्रदालु अपने मनो की मुरादे ले कर आते है। ओर जो भी भगत सच्ची श्रद्धा के साथ यहां आते है, उन की हर मुराद माँ ज्वाला देवी पूरी करती है। इस मंदिर में सदियों से जल रि एक अखंड ज्योति है, जो बिना घी और तेल से सदियों से जलती आ रि है।

यह मंदिर 52 शक्तिपीठो में से एक है। विज्ञानं से अलग यहां की मान्यताये अपनी एक अलग ही राह पर चली आ रही है। आज भी विज्ञानं के पास बहुत से रहस्मयी स्थानों के बारे में कुछ ख़ास जबाब नहीं है। यहां पर स्तिथ ज्वाला कई करोड़ो श्रदालुओ की आस्था का प्रतीक है।

हजारों वर्षों से प्रज्जवलित इस अखंड ज्योति का रहस्य आखिर है क्या, Secret of the monolithic light that has been lit for thousands of years

मंदिर के अंदर ज्वाला 9 जगहो से निकलती है, जो सदियों से ना तो कम हुई है और ना ही इस की अगनि की रौशनी में किसी प्रकार से कमी आई है। कहा जाता है की यहां पर स्तिथ यह ज्वाला माँ का मुख है, जिस कारण यहां का नाम ज्वाला जी पड़ा, यह मंदिर बहुत ही खूबसूरत और सौंदर्य से भरपूर है, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस स्थान में देवताओ और राक्षशो के बिच बहुत बड़ा युद्व हुआ था। जो हजारो साल चला था। इस युद्व में देवताओ को हार का सामना करना पड़ा, इस परिस्तिथि से निकलने के लिए सभी देवताओ ने अपनी सभी शक्तियों को एक सात इकठा किया, जिस से माँ आदि शक्ति का जन्म हुआ।

आदि माँ की अवतार माँ सती हुई, जिन का विवाह भगवान शंकर के साथ हुआ। माँ ज्वाला को श्रदालु साक्षात देवी मानते है। इस मंदिर के प्रागण में एक बहुत बड़ी घंटी है, जिसे नेपाल के राजा ने माँ को चढ़ाया था। यह स्थान सदियों से ही बहुत धार्मिक रहा है। बहुत से राजा महाराजा माता ज्वाला के दर्शन के लिए आते रहे है।

मुगलो का ज्वाला जी मंदिर पर आक्रमण

मुगल सम्राट औरंगजेब का जब भारत में शाशन हुआ करता था। तब उस ने अपनी हकूमत और अपने घमंड की वजह से हिन्दूऔ ओर यहां के हिन्दू देवी देवताओ व माँ ज्वाला को अपमानित करने की गलती कर दी थी। कहा जाता है, की मुग़ल शासक औरगजेब ने अपनी ताकत और हकूमत से पुरे भारत में अपना कब्ज़ा कर लिया था, औरंगजेब अपना शासन को पुरे भारत में स्थापित करना चाहता था।

औरंगजेब हिन्दुओ को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर करने लगा, वह चाहता था की हिन्दू धर्म को खत्म कर दिया जाए ओर यहां पर
इस्लाम धर्म को फैलाया जाए, जिस कारण उस ने बहुत से हिन्दुओ के धार्मिक स्थानों को नष्ट कर दिया। माँ ज्वाला मंदिर हिन्दुओ का एक बहुत है लोकप्रिय ओर प्रशिद्ध मंदिर था। जब औरंगजेब ने इस मंदिर के बारे में सुना तो उसने ऐसे तहस नहस करने का प्लान बनाया। कहा जाता है,की औरंगजेब से पहले मुगल सम्राट अकबर ने भी इस स्थान के बारे में सूना था, और उस ने भी माँ ज्वाला जी में कई सालो से जली आ रही चमत्कारी और धार्मिक ज्योति को बुझाने की कोशिश की थी। अकबर ने इस ज्योति को भुजाने के लिए बहुत से प्रयत्न किये,उस ने हर तरह से इस ज्वाला को भुजाने की कोशिश की,परन्तु माँ ज्वाला जी की अद्भुत शक्ति के आगे अकबर ने भी सिर झुका दिया।

माँ की इस विचित्र माया ओर चमत्कार को देख कर उसने यहां सोने का छत्र चढ़ाया जो आज भी इस धार्मिक स्थान में बिराजमान है। जब औरंगजेब ने इस मंदिर को नष्ट करने की योजना बनाई, तब उस ने सर्वप्रथम अपने सैनिको को यहां भेजा, इस से पहले की सैनिक यहां पहुंच पाते बिच रास्ते में ही उन के ऊपर बहुत सारी मदुमखियाँ मडराने लगी,और सैनिको को बापिस लौटना पड़ा। सैनिको के बापिस लौटने से औरंगजेब बहुत भयभित हुआ माँ की शक्ति का अनुमान उसे भी हो चुका था जिस के चलते उस ने यहां आने की योजना को बदल दिया और दिल्ली बापिस लोट गया।