सोलन जिले में स्तिथ देवी दुर्गा का अवतार “शूलिनी माता मंदिर”, Shoolini Mata Temple, the incarnation of the goddess Durga in Solan

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हिमाचल अपने धार्मिक स्थानों और देवी देवताओ के मंदिर के लिए पुरे देश भर में जाना जाता है।कुछ ऐसा ही एक स्थान है हिमाचल के सोलन जिले में शूलिनी माता मंदिर नाम से विख्यात है। यह लोकप्रिय शूलिनी मंदिर देवी शूलिनी को समर्पित है, यह धार्मिक मंदिर इस क्षेत्र के सबसे पुराने और पवित्र मंदिरों में से एक है। हर साल इस मंदिर में जून के महीने में एक वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है। जिसे बहुत भव्यता और जीवंतता के साथ मनाया जाता है। बहुत से लोग इस मेले में शामिल होते है। मान्यता है कि माँ शूलिनी सोलन जिले की देवी हैं, यह देवी लोगों के लिए समृद्धि लाती हैं, यहां के निवासी पुरे श्रद्धा और अटूट विशवास के लिए जाना जाता है।

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गुबंदनुमा शैली में कंकरीट का बना हुआ यह मंदिर, This temple made of concrete in a domed style

हर वर्ष शूलिनी मेला आयोजित किया जाता है, इस मेले में शूलिनी माता को श्रद्धांजलि दी जाती है और सोलन के प्रत्येक निवासी को मुफ्त में खाद्य सामग्री प्रदान की जाती है। सोलन का यह मेला ऐतिहासिक व राज्यस्तरीय मेला होता है। यह मंदिर आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व गुबंदनुमा शैली में कंकरीट का बना हुआ मंदिर है। यह लोकप्रिय और धार्मिक मंदिर भगवती शूलिनी का एक मंजिला प्राचीन मंदिर टीन की छत का बना हुआ मंदिर है। देवी की मूर्ति को पालकी में रखकर शहर के चारों ओर एक विशाल जुलूस निकाला जाता है।

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पौराणिक मान्यता के अनुसार, According to mythology

शूलिनी माता मंदिर के गर्भगृह में माता शूलिनी की दो मुख्य मूर्तियों के साथ देवी की अन्य चार मूर्तियाँ है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार लोकमतानुसार यह चारो देवियाँ शूलिनी की बहने है, इस जनमानस में हिंगलाज, जेठी ज्वाला, लगासन देवी और नैना देवी नाम दिया गये है। इसके साथ ही यहाँ इन मूर्तियों के साथ शिरगुल देवता और माल्ली देवता की भी अन्य मूर्तियाँ भी स्तिथ है।

प्राकृतिक आपदाओं से बचाती है यह देवी, This goddess protects from natural disasters

मान्यता है, की सोलन जिस का नाम बघाट रियासत था, यहां के शासक ने कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए पुरातन परम्परा से हर वर्ष आषाढ़ मास के दुसरे रविवार को मेले का आयोजन होता था। यहां के निवासियों की यह मान्यता है, कि भगवती शूलिनी के इस मेले को मनाये जाने से देवी क्षेत्र के लोगो की प्राकृतिक आपदाओं जैसे महामारी, भुखमरी, बाढ़, अन्नावृष्टि आदि से रक्षा करती रही है। इस मेले का मुख्य आकर्षण ठोडा खेल होता है। एक परिपाटी के अनुसार मेले का शुभारम्भ भगवती शूलिनी की शोभायात्रा से होता है।

बारह घाटों से मिलकर हुआ इस रियासत का निर्माण, This state was made up of twelve ghats

इस रियासत की नींव राजा बिजली देव ने रखी थी। इस रियासत की ख़ास बात यह है की यह बारह घाटों से मिलकर इस रियासत का निर्माण हुआ था। इस का क्षेत्रफल लगभग 36 वर्ग मील में फैला हुआ था। इस रियासत की प्रारंभ में राजधानी जौणाजी हुआ करती थी। इस रियासत के राजा दुर्गा सिंह अंतिम शासक थे। यह बहुत ही ऐतिहासिक स्थान माना जाता है। रियासत के विभिन्न शासकों के काल से ही माता शूलिनी देवी का मेला लगता आ रहा है। जनश्रुति के अनुसार बघाट रियासत के शासक अपनी कुलश्रेष्ठा की प्रसन्नता के लिए मेले का आयोजन करते थे।