हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी में ब्यास नदी पर बना पंडोह डैम,

हिमाचल प्रदेश में स्तिथ पंडोह बांध हिमाचल के जिला मंडी में ब्यास नदी पर बना एक तटबंध बांध है, यह बाँध ब्यास परियोजना के तहत सन् 1977 में पूरा हुआ था साथ ही इसका प्राथमिक उद्देश्य पनबिजली उत्पादन करना है, इसी के साथ यह

एक रन-ऑफ-द-रिवर पावर योजना का हिस्सा तथा यह सुरंगों और चैनलों की लंबी 38 किमी (24 मील) लंबी प्रणाली के माध्यम से दक्षिण-पश्चिम में ब्यास के पानी को मोड़ता है।

देहर पावर हाउस में बिजली उत्पादन के लिए पानी का उपयोग किया जाता

इसी के साथ यह बाँध सतलुज नदी में दोनों नदियों को जोड़ने से पहले यह देहर पावर हाउस में बिजली उत्पादन के लिए पानी का उपयोग किया जाता है,

इसी के साथ इस पावर हाउस की स्थापित क्षमता 990 मेगावाट है, यह सतलुज नदी के लिए 256 क्यूसेक (9,000 क्यूसेक) ब्यास के पानी को डायवर्ट करती है जो प्रोजेक्ट पूरा हुआ।

तटबंध बांध के साथ-साथ एक बड़ा कृत्रिम बांध

साथ ही यह तटबंध बांध के साथ-साथ एक बड़ा कृत्रिम बांध भी है, यह आम तौर पर मिट्टी, रेत, मिट्टी या चट्टान की विभिन्न रचनाओं के एक जटिल अर्ध-प्लास्टिक

टीले के प्लेसमेंट और संघनन द्वारा बनाया जाता है। इस के साथ घने, अभेद्य कोर के लिए एक अर्ध-विकृत जलरोधक प्राकृतिक आवरण है।

मंडी में स्तिथ इस बांध को सतह या सीपेज के कटाव के लिए अभेद्य बनाता

इसी के साथ हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी में स्तिथ इस बांध को सतह या सीपेज के कटाव के लिए अभेद्य बनाता है।

ऐसा बांध खंडित स्वतंत्र भौतिक कणों से बना होता है। कणों का घर्षण और अंतःक्रिया, कणों को एक सीमेंट पदार्थ के उपयोग के बजाय एक स्थिर द्रव्यमान में बांधता है।

ब्यास और सतलुज की 02 प्रमुख नदियाँ हिमालय से निकलती

मंडी में स्तिथ इस पंडोह बाँध में ब्यास और सतलुज की 02 प्रमुख नदियाँ हिमालय से निकलती हैं, इसी के साथ यह एक ऐसे बिंदु पर पहुँचती हैं जहाँ वे लगभग 36 किमी की एक फ़्लाय फ्लाई दूरी से अलग हो जाती हैं।

इसी के साथ यह लगभग 1,099 फ़ीट की ऊँचाई का अंतर होता है, साथ ही ब्यास के जल में बर्फ पिघल के निरंतर प्रवाह होता है। और पूरे वर्ष भर बहती है, यह बारहमसि नदी है जो पुरे वर्ष बहती रहती है।

1957 में पंजाब सिंचाई विभाग द्वारा तैयार की गई पहली योजना चली गयी

इस नदी प्रणाली की क्षमता का फायदा उठाने के लिए बनाई गई इस योजना में बिजली की क्षमता का अनुमान 1,000 मेगावाट था, साथ ही मूल रूप से ब्यास

परियोजना इकाई -I ब्यास सतलुज लिंक परियोजना नामक योजना ब्यास नदी के पानी को मोड़ने के लिए कई संशोधनों के माध्यम से चली गई, साथ ही 1957 में पंजाब

सिंचाई विभाग द्वारा तैयार की गई पहली योजना चली गयी थी। उसके बाद 1957 की योजना ने पंडोह में 11.26 किलोमीटर (7.00 मील) सुरंग, 19.31-किलोमीटर (12.00 मील) ओपन चैनल के साथ 4.82-किलोमीटर (3.00 मील) सुरंग में एक मोड़ बांध पर विचार किया।

1957 की रिपोर्ट के बाद 1960 की रिपोर्ट और 1961 में अंतिम प्रस्ताव

उसके बाद फिर से 1957 की रिपोर्ट के बाद 1960 की रिपोर्ट और 1961 में अंतिम प्रस्ताव था साथ ही इस अंतिम प्रस्ताव में पंडोह में 76.25-मीटर (250.2 फीट) के साथ डायवर्जन बांध, 7.62-मीटर (25.0 फीट) व्यास, 13.11 किलोमीटर (8.15 मील) पंडोह शामिल था।

इसी के साथ बैगी सुरंग, 11.8-किलोमीटर (7.3 मील) सुंदर नगर हाइडल चैनल, 8.53-मीटर (28.0 फीट) व्यास, 12.35 किलोमीटर (7.67 मील) सुंदरनगर

सतलुज सुरंग, 22.86-मीटर (75.0 फीट) व्यास 125 मीटर (410 फीट) हाई सर्ज शाफ्ट, तीन देहर पेनस्टॉक्स 06 पेनस्टॉक्स और देहर पावर प्लांट को 6 x 165 मेगावाट जनरेटर के साथ विभाजित करते हैं।

इस परियोजना को 1963 में मंजूरी दी गई और 1977 में कमीशन किया गया

मंडी में स्तिथ इस प्रणाली ब्यास के सतलुज के प्रति सेकंड (250 मीटर 3 / सेकेंड) के साथ 9,000 क्यूबिक फीट डायवर्ट करेगी इसी के साथ यह परियोजना का एक अतिरिक्त लाभ गोबिंद सागर के लिए बढ़ी हुई बाढ़ थी

जिससे भाखड़ा बांध में बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ गई साथ ही हरियाणा के राज्यों के लिए सिंचाई के पानी को जोड़ा गया इसी के साथ इस परियोजना को 1963 में मंजूरी दी गई और 1977 में कमीशन किया गया तथा उसके बाद इस कार्य शुरू किया जाएगा।

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